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मुहर्रम 2023 : Islamic New Year

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प्रस्तावना

भारत में हिंदी भाषी लोग और इस्लाम धर्म के अनुयायी दोनों के लिए मुहर्रम एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व ईमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। हम मुहर्रम का महत्व, इसकी रस्में और धार्मिक अदालतें, मुहर्रम के मतांग और मातम, अशुरा का महत्व, मुहर्रम की संस्कृति और परंपराएं, खान-धान, मुहर्रम के मुख्य प्रकाश स्थल, विशेष पर्वदीप, मुहर्रम और संगठन तंत्र, गैर-मुस्लिमों के लिए मुहर्रम, सामाजिक दायित्व, और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करेंगे।

मुहर्रम क्या है?

मुहर्रम ईस्लामी धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो हिजरी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम में मनाया जाता है। यह एक उपवास का पर्व है जिसमें विशेष मातम और शोक के आयाम होते हैं। मुहर्रम ईमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है, जो इमामी शिया मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह उनके और उनके साथियों के महान बलिदान की याद में आयोजित किया जाता है।

मुहर्रम का महत्व

मुहर्रम ईस्लामी संप्रदाय के अनुसार बहुत महत्वपूर्ण है। इसे विशेष श्रद्धा और आदर के साथ मनाया जाता है। मुहर्रम मुस्लिम समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है और उनके लिए एक महत्वपूर्ण उत्सव है जहां वे उनके धर्म, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव की याद में शामिल होते हैं। इस अवसर पर, मुस्लिम समुदाय में सभी उम्मीदवार एकजुट होते हैं और विशेष आयोजनों, मतांग और मातम के माध्यम से ईमाम हुसैन और उनके साथियों के बलिदान की याद को समर्पित करते हैं।

मुहर्रम की तारीखें

मुहर्रम के त्योहार की तारीखें हर साल हिजरी कैलेंडर के अनुसार बदलती हैं। मुहर्रम के पहले दिन को इस्लामी संप्रदाय में अशुरा के रोज़े के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व बहुत महत्वपूर्ण होता है और अपनी विशेषता के लिए पहचाना जाता है। तारीखें आपके स्थान के ईमामबाड़े या मस्जिदों के आधार पर भी भिन्न हो सकती हैं।

मुहर्रम की रस्में और धार्मिक अदालतें

मुहर्रम के दौरान अलग-अलग रस्में और आयोजन होते हैं जो मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को एकजुट करते हैं। यहां कुछ मुहर्रम की प्रमुख रस्में शामिल हैं:

ताजिया प्रदर्शन

मुहर्रम में ताजियाओं का प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण रस्म है। यह ताजियां ईमामबाड़ों में ले जाई जाती हैं और वहां पूजा की जाती हैं। इसके साथ ही, लोग मातम करते हैं और मार्च के दौरान ताजियां लेकर शोक भारी प्रक्रिया को आयोजित करते हैं।

नोहा और मतम

मुहर्रम में नोहा और मतम का आयोजन किया जाता है। नोहा एक विशेष धार्मिक गीत होता है जिसमें विशेष तरीके से व्यक्ति के बलिदान की याद की जाती है। यह गीत मातम के दौरान गाया जाता है और लोग उच्च स्वर में गाते हैं। मतम में लोग अपने शरीर को कसकर मारते हैं और आपस में गले लगाते हैं जो उनके शोक को व्यक्त करता है।

ताजिया विसर्जन

मुहर्रम के अंत में, ताजियाओं को नदी या सागर में विसर्जित किया जाता है। यह रस्म इमामबाड़ों और मस्जिदों में सम्पन्न होती है और लोग एक साथ ताजियां विसर्जित करने के लिए उमड़ते हैं। इस रस्म के दौरान ध्वनि, दुःख और गम की भावना सुनने को मिलती है।

मुहर्रम के मतांग और मातम

मुहर्रम में मतांग और मातम के आयाम सम्मिलित होते हैं। मतांग वे लोग होते हैं जो ईमाम हुसैन की शहादत की याद में शोक मनाते हैं। ये लोग अपने शरीर को आयात करके विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन करते हैं जैसे कि ताल, कांटा और ब्लेड्स का इस्तेमाल करना। मातम में लोग अपनी शक्ति को प्रदर्शित करते हैं और ईमाम हुसैन और उनके साथियों के बलिदान के लिए शोक व्यक्त करते हैं।

अशुरा का महत्व

अशुरा मुहर्रम के दसवें दिन को कहा जाता है और यह एक महत्वपूर्ण दिन है जो मुहर्रम के दौरान मनाया जाता है। अशुरा का दिन मातम और शोक के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन लोग रोज़े का पालन करते हैं और ताजियाओं का प्रदर्शन करते हैं। यह दिन ईमाम हुसैन की शहादत की याद के साथ एक शुभ और पवित्र दिन माना जाता है।

मुहर्रम के साथ जुड़ी संस्कृति और परंपराएं

मुहर्रम भारतीय ईस्लामी समुदाय में अपनी विशेष संस्कृति और परंपराओं की वजह से अलगाव का कारण बनता है। इस दौरान, लोग मस्जिदों और ईमामबाड़ों में जमा होते हैं और मुहर्रम के आयामों का पालन करते हैं। धार्मिक गीतों और कलाकारी के माध्यम से, मुहर्रम की परंपराएं और संस्कृति को प्रदर्शित किया जाता है जो इसकी विशेषता हैं।

मुहर्रम में खान-धान

मुहर्रम में लोग खान-धान करने का विशेष महत्व देते हैं। इस दौरान लोग अपने घरों में और मस्जिदों में भोजन को बाँटते हैं और दूसरों को आमंत्रित करते हैं। यह एक परंपरागत रस्म है जो समुदाय के सदस्यों के बीच एकता और सामरस्य को प्रदर्शित करती है।

मुहर्रम के मुख्य प्रकाश स्थल

मुहर्रम के दौरान, कुछ स्थानों पर ख़ास रूप से प्रकाश बदल जाता है जो मुहर्रम के उत्सव को आत्मसात करता है। यहां कुछ मुख्य प्रकाश स्थल हैं:

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

लखनऊ में जमात-ए-इस्लामी के ईमामबाड़ों में मुहर्रम के दौरान भव्य प्रकाश प्रदर्शित किया जाता है। यहां लोग ताजियां लेकर बड़े प्रकाश प्रदर्शन के साथ निकलते हैं और ताजियां विसर्जित करने के लिए नदी में जाते हैं।

दिल्ली

दिल्ली में भी मुहर्रम के दौरान ईमामबाड़ों और मस्जिदों में प्रकाश प्रदर्शित किया जाता है। मुहर्रम के पावन दिनों में दिल्ली की गलियों में भी बहुत सारे ताजियां और प्रकाश प्रदर्शन देखे जा सकते हैं।

लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश

लखीमपुर खीरी शहर में भी मुहर्रम का उत्सव विशेष रूप से मनाया जाता है। यहां लोग ताजियां लेकर शोक भरी प्रक्रिया के साथ निकलते हैं और ताजियां विसर्जित करते हैं।

विशेष पर्वदीप

मुहर्रम के दौरान, कुछ स्थानों पर विशेष पर्वदीप दिखाए जाते हैं जो उत्सव को रोशनी से भर देते हैं। इससे ऊँचा एक विशेष पर्वदीप ऊंचाई से चढ़ाया जाता है और यह देखने में बहुत सुंदर लगता है। इससे मुहर्रम के दौरान भक्तों को भावनात्मक और धार्मिक अनुभव मिलता है।

मुहर्रम और संगठन तंत्र

मुहर्रम का उत्सव ईमामबाड़ों, मस्जिदों, और संगठन तंत्रों के माध्यम से संगठित किया जाता है। इन संगठनों द्वारा आयोजित की जाने वाली प्रक्रियाएं और आयोजन मुहर्रम के महत्व को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। संगठन तंत्र में समुदाय के सदस्यों को एकत्रित किया जाता है और विभिन्न कार्यक्रम और सेवाएं आयोजित की जाती हैं।

गैर-मुस्लिमों के लिए मुहर्रम

मुहर्रम एक ईस्लामी त्योहार होने के बावजूद, यह भारतीय सामाजिक संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे गैर-मुस्लिम समुदाय और अन्य लोग भी सम्मान और आदर के साथ मान्यता देते हैं। यह एकता, सामरस्य और समर्पण की भावना को प्रकट करता है और सभी धर्मों के बीच सद्भाव बढ़ाता है।

सामाजिक दायित्व

मुहर्रम एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व भी है जो मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के लिए है। इस अवसर पर, लोग धार्मिक और सामाजिक सेवाएं करते हैं और गरीबों के लिए खाना वितरित करते हैं। यह एक आदर्श उदाहरण है जो सामाजिक न्याय और सद्भाव की भावना को बढ़ाता है।

संक्षेप में मुहर्रम

मुहर्रम एक महत्वपूर्ण ईस्लामी त्योहार है जो ईमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। इस त्योहार में भक्त ईमामबाड़ों और मस्जिदों में एकत्रित होते हैं और विभिन्न रस्मों, मतांग और मातम के माध्यम से ईमाम हुसैन के बलिदान की याद करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अवसर है जो एकता, सामरस्य और आदर की भावना को प्रकट करता है।

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एकांत में आपका स्वागत है

यदि आप चाहें तो आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर अपने पसंदीदा गीत या फिल्म देख सकते हैं और एकांत में समय बिता सकते हैं। इससे आपको मानसिक शांति मिलेगी और आपके मन को शांत करने का एक सुनहरा अवसर मिलेगा।

समापन

मुहर्रम 2023 एक महत्वपूर्ण ईस्लामी त्योहार है जो ईमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर भक्त अपने धार्मिक और सामाजिक दायित्व को प्रकट करते हैं और ईमामबाड़ों और मस्जिदों में एकत्रित होते हैं। यह उत्सव एकता, सामरस्य और सद्भाव की भावना को प्रोत्साहित करता है और समाज के सभी वर्गों के लोगों के बीच सद्भाव का बढ़ावा करता है।

मुहर्रम : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

10वें मुहर्रम या आशूरा का महत्व इस्लामी इतिहास में बहुत अधिक है। प्रविष्ट और प्रेरित शिया और सुन्नी मुस्लिम समुदाय इसे अलग-अलग रूपों में मनाते हैं। इस दिन को नवासा इमाम हुसैन और उनके साथियों के शहादत की याद में भावुक होकर रोज़े, नमाज़ और चारित्रिक मातम के साथ बिताते हैं।

मुहर्रम का आगमन तिथि हर साल चंद्रमा के देखे जाने के बाद तय की जाती है, इसलिए यह तारीख हर साल बदलती रहती है। इस साल 20 जुलाई 2023, दिन गुरुवार से शुरू हो रहा है।

जैसा कि पहले बताया गया, मुहर्रम की तारीख नियंत्रित होती है, मुहर्रम की पहली तारीख 20 जुलाई को होगी. जिसके चलते मुहर्रम की दसवीं तारीख यानी 29 जुलाई को यौम-ए-आशूरा मनाया जाएगा

मुहर्रम के पहले 10 दिन को "अशरा-ए-मुहर्रम" कहा जाता है, और इस पीरियड में मुस्लिम समुदाय विभिन्न रियासतों में आम तौर पर चारित्रिक मातम और यात्राएं करते हैं।

हां, मुहर्रम में शादी की इजाजत है। मुहर्रम के रोज़े रखने वाले व्यक्ति इस महीने में शादी कर सकते हैं।

निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है। इन दो आयतों में उल्लिखित पुरुष की सभी महिला रिश्तेदारों को उसकी महरिम माना जाता है, क्योंकि पत्नी की बहन को छोड़कर, उससे शादी करना उसके लिए गैरकानूनी (हराम) है , जिससे वह शादी कर सकता है यदि वह अपनी बहन को तलाक देता है, या यदि उसकी पत्नी मर जाती है।

हां, मुहर्रम एक महत्वपूर्ण इस्लामी धार्मिक त्योहार है और कुछ इस्लामिक देशों में यह अवकाश के रूप में मनाया जाता है।

मुहर्रम में मुस्लिम समुदाय विभिन्न धार्मिक रस्मों को मानते हैं। वे रोज़े रखते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं, क़ुरबानी करते हैं, चारित्रिक मातम करते हैं, मार्सिया गाते हैं, और इमामबाड़े और दरगाहों की ज़ियारत करते हैं।

मोहर्रम एक दुखद महीना है क्योंकि इसमें मुस्लिम समुदाय को अपने प्रियजनों के शहादत की याद और दुख का अनुभव कराता है। मुहर्रम के दस दिनों में हुसैन इब्न अली और उनके साथियों की शहादत की घटना हुई थी जो उनके भक्तों के दिलों में अभिशाप बन गई है।

जी हां, मुहर्रम में नॉन-वेज खाने में कोई रोक-टोक नहीं है। मुहर्रम में रोज़ेदार मुस्लिम समुदाय दिनभर न खाने पीने में व्यतिगत त्याग दिखाते हैं, लेकिन यह सभी लोगों के लिए बाध्यकारी नहीं है।

मुसलमानों का मानना है कि मोहर्रम के इस माह में अल्लाह की खूब इबादत करनी चाहिए। पैगंबरों ने इस माह में खूब रोजे़ रखे। जानकारी के लिए बता दें कि अल्लाह की बन्दगी तो आठों पहर और सोते जागते करनी चाहिए। अल्लाह की बन्दगी का कोई महीना विशेष या दिन विशेष नहीं होता।

हां, मुहर्रम में मुस्लिम रोज़ेदार रह सकते हैं। अशरा-ए-मुहर्रम में रोज़ा रखना बड़ी खुशियों और शान्ति के साथ मनाया जाता है।

नहीं, मुहर्रम में मातम मनाना बिल्कुल हराम नहीं है। मातम को अशरारी और सुन्नी मुस्लिम समुदाय दोनों में मान्यता है, और वे यह शाहर को दुखी होकर और शहीदों की याद में करते हैं।

मुहर्रम में मुस्लिम समुदाय बहुत सारी विशेषता वाले खाने खाते हैं जैसे कि हलिम, नान, फलूदा, कच्चे गोश्त के पकवान और मीठे दिशाओं को भी तैयार करते हैं।

मुहर्रम में व्रत नहीं रखा जाता है, बल्कि मुस्लिम समुदाय रोज़े रखते हैं जो उनके धार्मिक त्योहारों में से एक है।

मुहर्रम इस्लामी इतिहास में एक विशेषता वाला माहीना है जो हुसैन इब्न अली और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। इसमें विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है और इसे श्रद्धांजलि भाव से भावुकता से मनाया जाता है।

हां, सुन्नी मुस्लिम समुदाय में भी कर्बला के घटनाक्रमों के विश्वासी होते हैं और वे भी मुहर्रम में हुसैन इब्न अली की शहादत को याद करते हैं।

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